मेरे विचार आपके सामने

नया सफर नई दिशा

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मनु (tosi)


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अस्मत

Posted On: 24 Feb, 2012  
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Others न्यूज़ बर्थ मेट्रो लाइफ लोकल टिकेट में

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Posted On: 24 Feb, 2012  
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कोशिश

Posted On: 22 Feb, 2012  
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Others मस्ती मालगाड़ी मेट्रो लाइफ लोकल टिकेट में

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“टूटा ख़्वाब ”

Posted On: 18 Feb, 2012  
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“पत्थर “

Posted On: 17 Feb, 2012  
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“तुम स्त्री हो ”

Posted On: 16 Feb, 2012  
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“तुम स्त्री हो “

Posted On: 16 Feb, 2012  
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ऑनर किलिंग पर मेरे विचार

Posted On: 15 Feb, 2012  
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Posted On: 15 Feb, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: Amresh Bahadur Singh Amresh Bahadur Singh

..मनु जी .....अतीत बड़ा लुभावना होता हैं चाहे वह कड़वा ही क्यों ना रह हों ,संघर्ष की जद्दोजहद,मूल्यों के विखरने की पीड़ा ,बदलाव की आतुर प्रतिक्षाएं बड़ी लुभावनी लगने लगती हैं जब हम कुछ हांसिल कर लेते हैं| आरक्षण जरूरी हैं किन्तु इसका आधार जातिगत ना होकर आर्थिक होना चाहिये ..मेडिकल की पढाई के साथ मैं शिक्षा के भी जुड़ा हूँ .छोटे शहरो,कस्बो में आज के इस प्रतिस्पर्धी माहौल में सही किताबो तक का नहो पता चलता वही दूसरी ओर बड़े घरों के बच्चे कोटा ,कानपुर जाकर कोचिंग करते हैं ,इन परिक्षाओ में एक अंक से परिणाम पर क्या फेरक पड़ता हैं ,आपसे छुपा नही हैं |एक समय था जब इंटर की किताबे पर्याप्त होती थी ,पर आजकल सोलोमन,पाउला ब्रुस ,जेनी मार्च, जे दि ली ,रेज्निक्स हालीडे ,इरोदोव को पढ़ना पड़ता हैं ,स्कूली शिक्षा ,खासकर यू पी बोर्ड का करिकुलम,अध्यापको का नजरिया ,पुस्तके ऐसी हैं की आप चाह कर भी इस बोर्ड की पढाई से IIT/AIEEE/AIPMT जैसी परिक्षाए नही निकाल सकते ,और फिर IIT की परीक्षा का नया फरमान .....|क्या यू पी बोर्ड के बच्चों और आर्थिक रूप कमजोर परिवार के बच्चों के हित में हैं ये बातें ?सरकार को उचित आधार पर आरक्षण देकर ,समाज के सभी तबको के हित में कार्य करना चाहिये ..................... आपका –अजय

के द्वारा: ajaykr ajaykr

मनु जी सादर नमस्कार, आरक्षण के मूल में जाएँ तो इसको लागू करने के पीछे का कारण यह रहा है की समाज के कई वर्ग अन्य वर्गों से काफी पिछड़े हुए थे क्योंकि उच्च वर्ग द्वारा इनका काफी शोषण किया गया था इनको आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिल पाया था. राजनीतिज्ञों ने उनकी इस दुर्दशा को समझा और आरक्षण का फार्मूला अपनाया, किन्तु उसे सही प्रकार से लागू नहीं किया जा सका यह पहली गलती थी दूसरी गलती यह हुई कि निर्धारित समय के पश्चात भी इसके सही परिणामो को प्राप्त नहीं किया जा सका, जब सही लागू ही नहीं हुआ तो अच्छे परिणामो कि आस कैसे रहे. फिर तीसरी गलती जिसको आज देश का एक बड़ा वर्ग भोग रहा है, सिर्फ राजनैतिक स्वार्थ के कारण आरक्षण को बंद नहीं किया गया. जब कि आज कि आवश्यकता है कि आरक्षण को बंद करके पुनः इसकी समीक्षा हो और जहां इसकी जरूरत हो वहीँ इसे लागू किया जाए. गरीबी या जाति के आधार पर इसे लागू करना देश कि प्रतिभाओं के साथ खिलवाड़ ही माना जाएगा.

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: मनु (tosi) मनु (tosi)

के द्वारा: मनु (tosi) मनु (tosi)

के द्वारा: मनु (tosi) मनु (tosi)

के द्वारा: मनु (tosi) मनु (tosi)

पूनम जी नमस्कार...........बन्दूक हमारे घर में थी , जब से हम बहुत छोटे थे तब से... पर चलने का विवेक घर परिवार से मिला..........आज लाइसेंस से अपने नाम भी एक ले ली तो क्या कही भी चला दें? आपका ध्यान एक खबर पर खीचता हूँ, जागरण में पिछले हफ्ते आई थी, सोलह साल की एक बाला का विवाह जज ने पर्सनल ला की वजह से वैध करार दिया..........अब ये क्या है? और वो भी इसी देश में. तब शारीरिक परिपक्वता की बात किसी ने नहीं की. ये दोनों बातें इसलिए की मै आपके लेख के अंतिम पैरा से सहमत हूँ . हमारे संसथान के पास गत एक वर्ष में बलात्कार के ऐसे तीन मामले आये जो की इसलिए बलात्कार की संज्ञा में आ गए क्यों की सम्बन्ध उजागर हो गए थे. जब तक प्रेम सम्बन्ध प्रकाश में नहीं आया तब तक सब ठीक था. और आज की सच्चाई ये है की एक बड़ा प्रतिशत है युवाओं का जो की अठारह की वय के पहले ही सम्बन्ध बना लेते हैं........उनके संबंधों का सामजिक निषेध ठीक है पर कानूनी गलत है. क्यों की ९० फ़ीसदी मामलों में कानूनी मदत प्रतिशोध के लिए ली जा रही है.

के द्वारा: anoop pandey anoop pandey

के द्वारा: nishamittal nishamittal

के द्वारा: मनु (tosi) मनु (tosi)

के द्वारा: मनु (tosi) मनु (tosi)

के द्वारा: मनु (tosi) मनु (tosi)

आदरणीय तोशी जी , सादर नमस्कार ! मैं नहीं समझ पाया की आप इतनी प्रतिभाशाली हैं ! संवेदनायें मर गयी हैं , आज के इंसान की ! ये जो आपने बयान किया है सच में , समाज की असलियत है जिसे हमने और आपने देखा है ! मैं आज आपकी इस रचना पर , मेरे दिल में जितना आपके लिए सम्मान है वो सब उड़ेल देना चाहता हूँ किन्तु बुखार इतना ज्यादा है की लिखने में उंगलियाँ कांप रही हैं ! आपका ये ब्लॉग मैंने कल ही पढ़ लिया था किन्तु बुखार की वज़ह से ही कल आपको कमेन्ट नहीं दे पाया , क्षमा चाहता हूँ ! असल में होता क्या है की जो समाज के ठेकेदार , या अपने आप को मोहल्ले का सरदार समझने वाले सिर्फ अपनी बहन बेटियों को तो समझते हैं की कोई उन्हें बुरी नज़र से भी न देख पाए किन्तु दूसरी कोई लड़की या महिला ( पागल ही सही ) उन्हें एक उपयोगी वास्तु लगती है ! बहुत बहुत सुन्दर रचना ! आदरणीय तोशी जी , अगर मेरे किसी शब्द या शैली से सहमत न हों तो कृपया अन्यथा मत लीजियेगा !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: vikramjitsingh vikramjitsingh

मनु जी ज्ञानवर्धक आलेख के लिए धन्यवाद ....वैसे जिस संभावित खतरे को आपने अपने लेख के ज़रिये इंगित किया है ,वह सिर्फ 'Tip of the Ice berg 'है ....polythene में खाद्य पदार्थ लाना ,अलमुनियम के बर्तन में खाना पकाना ,CFC युक्त प्रोडक्ट जैसे (Perfume,essense stick,Friz) वगैरह इस्तेमाल करना ,ज्यादा पैसे बटोरने की नीयत से सब्जियों ,मुर्गों ,बकरों का आकार बड़ा करने के लिए उन्हें anti -biotic देना ..और लोगों द्वारा उन्हें आहार के रूप में इस्तेमाल करना ....ऐसे अनगिनत खतरे सुरसा जैसा मूंह बाये लोगों को लीलने के लिए खड़े हैं ....भारत के घरों में छत के लिए एस्बेस्टस का इस्तेमाल होता है ..यूरोपीय देशों में एस्बेस्टस के इस्तेमाल पे प्रतिबन्ध है क्यूंकि इससे कैंसर का खतरा होता है ..वहां के खेतों में organic -produces pesticide वाले produces की जगह ले रहे हैं ....निदान लोगों के चेतनाशील होने में छिपा है ...आपने इस दिशा में प्रयास किया है इसके लिए धन्यवाद -पवन ( लैप टॉप वाला सूफी )

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

अपने तो कमाल का रहस्य पैदा कर दिया है....'जान मरने की धमकी और मैं.....' ये तो हद हो गई.....एक चीटी भी मुझसे मरेगा की नहीं इसमे शक है....... आप मेरे पे इतनी अनुकंपा कीजिए Please Please वो वो धमकी की कॉपी मेरे मेल ID पर मुझे भेज दीजिए.....मैं सच मे देखना चाहता हूँ......की वो क्या है...... "कारण आपको क्यूँ बताऊँ ??? " मत बताइए...मैंने उसे कॉपी कर के save कर लिया है......  :) .....हाँ लेकिन अगर किसी के विरोध के कारण अगर आपने हटाया है तो ज़रूर बताइए...... "लेकिन आप ऐसा करते क्यूँ हैं ??? दूसरों को परेशान करने में आपको इतना आनंद क्यूँ आता है " ....ये राज़ की बात है मैं भी आपको क्यों बताऊँ........ :)   आप मुझे वो मेल  भेज दीजिए मैं फिर आपको बता दूँगा....... " दिखने मे तो ठीक ठाक हो … फिर........"  हूँ....Hun......!(गला साफ कर रहा हूँ )  'ये Pakiya, एक कप चाय लगा मैडम जो को चाय पीला ज़रा.....'   'जी भाई अभी लाता हूँ.....कटिंग चलेगी क्या.....'   'हाँ चलेगी बे जल्दी ला....'

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

टीचर जी, गुड ईवनिंग, ''Pakiya'' .... 'उपस्थित हूँ मैडम' "लखना'' .......'जी टीचर जी हाजिर हूँ' ..............अच्छा, बच्चो आज हम लोग ग़ज़ल सीखेंगे.....'माईडम जी ऊ का होता है'........... 'अरे बाबा वही तो सीखना है....' 'जी मडम जी तो सिखाईए' ये अच्छा है.....'कहीं से ईट, कहीं से पत्थर भानुमती ने कुनमा जोड़ा...' ये अच्छा किया आपने हम लोगो को ग़ज़ल सीखा दिया.....शब्द तो हम सिख ही चुके थे.......बाँकी काम आपने कर दी......कॉपी अँड पेस्ट ......! इसको कहते है कालाकारी......... (जानकारी बाँटने के लिए धन्यवाद........, बाबू लोग मन लगा के पढ़ो....ज्ञान है बाँटने से बढ़ता है....) हम अन्धो की जिंदगी मे ज्ञान का दीपक जलाने के लिए लाख लाख सुकरिया.....! yeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeee! छुट्टी.......................! (यहाँ भी महोदय हमारी ही गलती और वो क्या जो आप लोगो को डराते हैं कभी जान से मारने कि धमकी देते हैं … अरे ये तो सोचिए महाशय !हमारी जगह कोई और होता तो उसका तो डर के मारे राम – नाम सत हो गया होता तो , ये तो हम हैं कि बच गए … follyofawisemanजी".................ऐसा आपने मेरे बारे क्यों लिखा.....ये आपके माँ पोस्ट के सबसे नीचे पोस्ट है.......मुझे समझ मे नहीं आया यह.....क्या था ये....)

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

ज़िंदगी का साथ भी जैसे बस छूटने वाला था ॥ पलकें बंद की कि क्या छोडू क्या पाऊँ मैं किसी को क्यूँ अपनी बातें समझाऊँ॥ बंद आँखों में तभी एक अपना दिखाई दिया मुझे मेरी माँ का सपना दिखाई दिया ॥ दौड़ कर जा पहुँची अपनी माँ के पास उसने एक मौन के साथ फेरा सिर पर हाथ ॥ अश्रु एक निकला मेरा जा गिरा माँ की गोद में बिना पुछे ही माँ को जैसे सब हो गया एहसास॥ लेकिन आदरणीय तोशी जी , सादर नमस्कार ! ना मालुम कैसे आपकी ये रचना मेरी से छूट गई ! देरी से इस पोस्ट पर आने के लिए क्षमा चाहता हूँ ! माँ , मुझे लगता है एक व्यक्ति होने से ज्यादा एक एहसास है , एक परिणति है अपने ख्वाबों की ! एक शक्ति है , एक संबल है , एक माध्यम भी है अपने सपनो को हकीकत में बालने की एक सीढ़ी भी है ! माँ , जैसे नाम में ही ईश्वर नज़र आता है ! माँ की परछाईं हम में होती है ! अगर आप ध्यान से देखें तो किसी बच्चे में ( विशेषकर लड़कियों में मतलब बहनों में ) माँ का अक्स दीखता है ! बहुत बेहतर !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय जवाहर भाई जी , सादर नमस्कार ! आप सही कह रहे हैं परंतु एक अंतर हैं इन नदी नालियो के किनारे उगाई जाने वाली सब्जियों और खेतो में उगाई जाने वाली सब्जियों मे वो ये कि दूषित जल के किनारे उगाई जाने वाली सब्जी हमेशा जहरीली होती है और गंदे पानी में धोने के कारण उनमें कई ज़िंदा विषाणु हमारे शरीर में पहुँच जाते हैं जो कई घंटो तक घनी आग पर उबालने के बाद भी नष्ट नहीं होते वो ज़िंदा रहते हैं जबकि खेतों में उगाई जाने वाली सब्जियों पर होने वाले रसायनो को का प्रभाव सही से धोने के बाद पकाने पर काफी हद तक कम हो जाता है । इसलिए खेतों कि सब्जियाँ ज़्यादा बेहतर हैं एक तो वो हमे सीजन में मिलती हैं , दूसरे गंदे पानी मे नहीं धोई जाती ,

के द्वारा: मनु (tosi) मनु (tosi)

के द्वारा: मनु (tosi) मनु (tosi)

के द्वारा: मनु (tosi) मनु (tosi)

मैंने अपने साथी को इसी उम्मीद से निहारा मगर कुछ दुख अपनी पलकों में फिर बंद कर लिए मैंने अपने बच्चों को भी इसी हसरत से पुकारा पर उन्होने भी बयान अपने सवाल चंद कर दिये ॥ पर जिन अपनों से ही शिकायत हो उनसे कैसे कहें अपनी बात जो ‘सपने’ चुभते हो पलकों में उन्हे कैसे लगाएँ हाथ ॥ मैंने हर तरफ इस उम्मीद से देखा कहीं तो कोई मेरा होगा जिससे कह सकूँ मैं हर बात पोंछ मेरे आँसू जो रो लेगा मेरे साथ ॥ आदरणीया तोसी जी ये सच है माँ के सिवाए कोई नहीं समझ सकता .. क्योंकि वही है जो बिना सवाल किये आपके संतावना के लिए साथ कड़ी मिलती है .. पुरे धैर्य के साथ ......... बिना कोई तर्क के ... सच तो यही है हम कुछ रच नहीं रहे यंहा बस अपनी माता के साथ अपने सम्बब्धो को साझा कर रहे है .. इस लिए मैं औपचारिकता नहीं करुँगी की ... आपकी रचना अच्छी है ...आदि आदि बस यही कहूँगी आपकी माता जी की याद में काश वो होती आपके साथ तो ये तन्हाई न होती अपनों के होते हुए भी रुसवाई न होती ना कोई तर्क होता ना लबो पे सवाल होता देख के तेरा उतरा चेहरा बस तेरे साथ होती और तेरा प्यार होता

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

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के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

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वैसे तो मैं मूलतः कवि नहीं हूँ, किन्तु जागरण जंक्शन के कुछ कवियों से प्रेरित हो कर कविता लिखने का प्रथम प्रयास कर रहा हूँ, कविता अगर पसंद आए तो खुले दिल से मेरी सराहना कीजिएगा ताकि मैं और भी ऐसी खूबसूरत कविताएँ लिखने के लिए प्रेरित हो सकूँ..........आपका Wise Man ! ऊपर आम का छतनार, नीचे हरे घास हज़ार, और वन-तुलसी की लताएँ करने गलबहियाँ तैयार, लेके चाकू और कटार, जब हो ओलो का प्रहार, बिमला मौसी का परिवार, चुने टोकरी मे अमियाँ फिर डाले उनका आचार... यह खेल चले दो तीन महीने लगातार.... फिर आए जाड़े का मौसम, पड़े शीत की मार, छोटू को हो जाए बुखार..... डॉक्टर की दवाई फिर करे छोटू का उद्धार..... फिर आए गर्मी की ललकार, सर्वत्र मचे हाहाकार, और जब लाइट न हो और हो पंखे की दरकार, मचाए सब चीख-पुकार, चले प्रक्रिया यह बारंबार, फिर आए बसंती बहार, इस मौसम के बारे में मैं कहूँगा अगली बार...... तब तक के लिए मेरा सादर नमस्कार.....

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

नमस्कार मनुजी... महिलाओं के ऊपर होने वाला जुल्म/अत्याचार कोई नयी बात नहीं है... अगर इतिहास पर गौर करें तो तमाम होने वाले युद्धों में खामियाजा महिलाओं को उठाना पड़ा है.....पहले भी तमाम देशो की सरकार ने महिला सुरक्षा के लिए तमाम कानून बनाये मगर कुछ ही कारगर हुए ... अभी जिन वजहों से महिला सुरक्षा सबसे ज्यादा कारगर है वो है संचार क्रांति.. जिस तरह से पिछले कुछ दशकों से संचार क्षेत्र में क्रांति आई जैसे टीवी चैनलों की संख्या में इजाफा या इन्टरनेट क्रांति या मोबाइल फ़ोन ..इन सबसे महिलाओं को सबसे ज्यादा फायदा हुआ बजाय सरकार के किसी एक्ट से... अभी अगर महिला के साथ कुछ घटित होता है.. तो संचार क्रांति की वजह से सरकार और समाज पर एक दबाव बनता है.. इसके कुछ उदाहरण हैं.. बंगाल के बीरभूम इलाके में एक आदिवासी लड़की को नग्न घुमाने को मामला.. जिसे बाद में( लगभग ३ महीने बाद ) एक MMS की वजह से न्याय मिला.. या फिर पाकिस्तान की मुख्तारन माई जिसके साथ गाँव के पंचों ने जबरन बलात्कार का मामला हो या पाकिस्तान की हिन्दू लड़की रिंकल कुमारी जिसका जबरन धर्म परिवर्तन किया जा रहा था..या जेसिका लाल... आरुषी..या ..और भी कई नाम ...ये सब मामले संचार क्रांति जी वजह से ही सामने आते है... आजकल महिलाये फ़ोन या मीडिया की वजह से ज्यादा सुरक्षित हैं.. बजाय सरकार के किसी एक्ट की वजह से... पहले तो मामले पता भी नहीं चलते थे और महिलाएं घुट-घुट के जीने को विवश थी.. वहीँ जहाँ से फ़ोन से कुछ फायदे हुए हैं.. इनसे समस्या भी हुई... बहुत से MMS कांड भी सामने आये हैं ..और आते जा रहे हैं... सबसे बुरा हाल बिहार, झारखण्ड, बंगाल, आसाम की आदिवासी और पिछड़े इलाकों का हैं.... जहाँ से मजबूर लड़कियों की तस्करी तक हो रही है... इस बारे में मिडिया को, समाज को सरकार पर और भी दबाव बनाने की जरूरत है... खैर इस बारे में लिखने को बहुत कुछ है... मगर कमेन्ट तौर पे इतना ही... मार्मिक और दर्द भरे लेख के लिए और ब्लॉगर ऑफ़ दे वीक के लिए बधाई.....

के द्वारा: yogeshkumar yogeshkumar

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विवेचना करने की अच्छी कोशिश है | लेकिन एक बात समझ में नहीं आती, आखिर वो कौन सी वजह है जिसके कारण ऐसी शर्मनाक घटनाये होती है ? लोग पोलिस - प्रशासन की नाकामी को बताकर वाहवाही लूटने की कोशिश करते हैं , लेकिन मूल-जड़ तक जानने , समझाने की कोशिश बहुत ही कम लोग करते है | हमारे समाज और इन घृणित अपराधों के बीच एक ऐसी साजिश रची जा रही है , जो बंद आँख से दिखाई नहीं देती है | और इस साजिश का परिणाम है - बढते अपराध और अमीर होते कुछ लोग | अन्यथा नारी का जो सम्मान भारत में था और आज भी है , वो पुरे विश्व में कहीं भी नहीं है | भारत दुनिया का अकेला ऐसा देश है जहाँ नारी को 'देवी ' कहा जाता है | आज गुरु नानक देव जी का दोहा याद आता है कि- बुरा देखन मै चला , बुरा ना मिलियो कोय ; मन जो आपणा खोजा , तो मुझ से बुरा ना कोय |

के द्वारा: Bhupendra singh Litt Bhupendra singh Litt

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ठीक कहा आपने पर एक बात और विचारणीय है क्या वह नारी जिसके साथ बलात्कार हुआ है वह क्या ऐसी घटनाओं के खिलाफ खुद आवाज उठाती है क्या कभी सबके सामने खड़े होकर बेवाकी से कहती है कि यही है वह दरिंदा, इसको पकड़ो. इसके विपरीत जैसे ही ऐसा कुछ होता है तो खुद वह महिला, उसके परिवार वाले, नातेदार-रिश्तेदार मिलकर मामले को दबाने की फ़िराक में लग जाते हैं. कभी- कभी तो जाँच तक में सहयोग नहीं करते . कौन जिंदगी भर के लिए कलंक का टीका माथे पर लगवाये आज भी मूलत:हमारा समाज ही इसमें स्त्री का दोष ही देखता है "उसे ऐसे कपडे नहीं पहनने चाहिए थे, ऐसे नहीं करना चाहिए था, ऐसे नहीं चलना चाहिए था, इस समय घर से नहीं निकलना चाहिए था आखिर क्यों? दरअसल यह सुरक्षा तंत्र की नहीं सामाजिक तंत्र की नाकामी है जब तक स्त्रियाँ ही ऐसे मामलों को कलंक की तरह लेती रहेंगीं, एक दुर्घटना की तरह नहीं लेंगीं; तब तक तस्वीर बदलने वाली नहीं है सिर्फ सरकार और शाशन तंत्र को कोसने से क्या होगा? क्या सरकार के लिए यह संभव है कि हर महिला को व्यक्तिगत सुरक्षा मुहैया करा सके? यह ताकत महिलाओं को आपने आप में खुद पैदा करनी होगी, मानसिक स्तर पर और शारीरिक स्तर पर भी जिसमे लड़कियों का स्व सुरक्षा के उपाय सिखाना भी शामिल हो सकता है. सही मुद्दे पर उंगली रखने के लिए आपका धन्यवाद, सम्मान के लिए बधाई. जागरण जंक्शन के इसी मंच पर इसी सोच को लेकर (बलात्कार के प्रति समाज के इसी नजरिए को इंगित करती) मेरी एक कविता के "ग्लानि बोध" (http://drarvinddubey.jagranjunction.com/2011/04/08/6/) नाम से प्रकाशित है अगर समय मिले तो उसे जरुर पढिये और अपनी प्रतिक्रिया दीजिये, अरविन्द दुबे

के द्वारा: drarvinddubey drarvinddubey

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

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के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

पूनम जी नमस्कार, वाणिज्यीक संस्थानों पर महिलाओं सम्बन्धी क़ानून लागू करा कर, पंजाब सरकार से एक अच्छा कार्य किया है. हाँ मगर हम इसको जब यौनशोषण जैसी घ्रणित घटनाओं से जोड़कर देखते हैं तो ये बहुत ना काफी है.आपने सही कहा है आवश्यकता तो एक मजबूत क़ानून बनाने की है. इसमें मै यह भी जोड़ना चाहता हूँ की इस तरह के मुजरिमों से निपटने के लिए विशेष न्यायालय बनाए जाएँ ताकि दोषी को सजा भी शीघ्र दी जा सके इससे महिला या उसके घर वालों पर जो दबाव बनाया जाता है जिसके कारण बयान बदलना पड़ता है और मुजरिम आसानी से छुट जाता है वह भी नियंत्रित होगा. ऍफ़ आई आर ऑन लाइन लिखी जाने की व्यवस्था को शीघ्रता से पूर्ण किया जाए तथा चिकित्सकीय जांच भी एक निर्धारित समय में होने की जवाबदारी पुलिस की सुनिश्चित की जाए. और सबसे महत्वपूर्ण बात यह की हम समाज में ही सुधार लाने का प्रयास करें. जहां हम छोटी छोटी बातों पर बंद या अन्य किसी तरह का आन्दोलन करने खड़े हो जाते हैं वहीँ हम आज तक इंटरनेट के माध्यम से परोसी जा रही गंदगी पर कभी कोई बंद नहीं करा पाए. विषय गंभीर है और इससे निपटने के लिए एक नहीं अनेक रास्ते बंद करना होंगे तभी जा कर हम कामयाब हो पायेंगे.

के द्वारा: akraktale akraktale

दिनेश जी, यक़ीनन रामराज की परिकल्पना आप ८-१० साल के उम्र में सोचते होंगे क्योंकि मैं भी उसी उम्र में सोचता था. हमारी विचारधारा काफी हदतक एक दुसरे से मिलती हैं. इसलिए मैं इस हकीकत से भलीभांति वाकिफ हूँ. मैं बिलकुल जमीनी हकीकत पर रहकर बातकर रहगा हूँ. पर मैं जो कहना चाह रहा हूँ वो बिलकुल समझ नहीं पायें हैं. एक बात कहना चाहूँगा कि आप जैसे विचारक से यह उम्मीद नहीं थी. आप जिस समाधान की बात कर रहे हैं, मैं उसका विरोध नहीं कर रहा हूँ पर मैं जिस समस्या का बात कर रहा हूँ वो आप समझ नहीं पा रहें हैं....एक बार अपना समाधान भूलकर, मेरी बातों पर चिंतन करिए. आपको जवाब मिल जायेगा क्योंकि मेरे और आपके चिंतन का परिणाम अलग नहीं हो सकता. यह मैं भलीभांति जानता हूँ.......लगता हैं आज कल आप दूसरों की तरह चिंतन और मनन करना अभिशाप समझ रहे है.........आपका और हमारा साथ बने रहे क्योंकि आनेवाले समय में दोनों का साथ जरुरी हैं. यह बात मैं दुबारा कह रहा हूँ. दिनेश जी आप खुद को भूल सकता हैं मैं आपको नहीं भुलसकता की आप कौन हो ? यह एक रहस्य है ? जिसे सिर्फ समय ही साल्व कर सकता है....

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

अनिल जी आप जो कह रहे है वह आदर्श राज्य की कल्पना है। आपकी सोच की तरह न तो यह धरती कभी हुई है और न संभवतः कभी हो सकती है। राम राज्य में भी ऐसा नहीं हो सका। ऐसी बातें बड़ी मनमोहक एवं काल्पनिक आनन्द प्रदान करती हैं। किन्तु सत्य के धारतल पर विलुप्त  हो जाती हैं। जैसा आप सोचते हैं वैसे तो शायद(शायद क्या निश्चित ही) ईश्वर भी नहीं हो सकते। तुलसी और विष्णु जी का मिथक सर्व विदित है। शिव जी का विष्णु के मोहनी रूप पर मोहित होना। आदि अनेक उद्धरण हैं। अनिल जी काल्पनिक दुनियाँ से निकलिये। सत्य की धरा पर पदार्पण कीजिये। मैं भी कभी ऐसी कल्पनायें करता था, लेकिन तब बच्चा था। संभवताः 8-10 साल का।शनैः शनैः बड़ा हुआ और सत्य का भान हुआ।    महत्वपूर्ण यह है कि हम (यदि कर सकते हैं तो) लोगों को जागरूप कैसे करे। समाज को सुसंस्कृत  कैसे बनायें।     पूनम जी जो समाधान सुझाये हैं हम सार्थक हैं। यदि उन सुझावों को मान्यता मिले तो निश्चित ही इस भयावह समस्या पर कुछ सीमा तक नियंत्रण में किया जा सकता है।    इसमें कुछ और सुझाव सम्मलित किये जा सकते हैं- 1.जिस क्षेत्र में बलात्कार जैसी घटना हो, वहाँ के जिम्मेदार ऑफिसर पर भी कार्यवाही की जाय। 2. केश को शीघ्र सुलझाकर 3 माह के अंदर बलात्कारी को फाँसी से कम सजा न मिले। 3.छेड़छाड़ करने वाले का  सार्वजनिक सामाजिक बहिष्कार हो। 4. नारी को बेटी, बहिन, पत्नि, माँ आदि सभी रुपों में सम्पत्ति का समान अधिकार प्राप्त हो। 5. मेरा बलात्कार हुआ कहने को ही एफ. आई. आर. मान लिया जाय। 6.पी़ड़िता के बयान एवं मेडीकल रिपोर्ट को ही सजा का आधार बनाया जाय।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

कितनो को सजा दिलवायेंगी आप! और भला पुलिस हर किसी को सजा क्यों देगी? क्या वो हम दरिंदो की श्रेणी में नहीं आते? क्या वो आसमान के फ़रिश्ते हैं जो हमसे भिन्न होंगे? आज जरुरत है मानसिक विकृति और गन्दी मानसिकता में बदलाव की जिसके कारण आये दिन हमारी माँ और बहने इसका शिकार हो रही है और गुनाहगार भले ही कोई एक हो पर दोषी हम सभी हैं. हममे से बहुत लोग अपनी माँ-बहन के अलावा किसी और की माँ-बहन को माँ बहन नहीं समझते. उनमें से मैं भी एक हूँ और इस हकीकत से इंकार नहीं करूँगा . पर कुछ लोग ऐसे हैं जो खुद की माँ-बहन को भी नहीं छोड़ते. पर वो हमसे अच्छे हैं क्योंकि सभी औरत जाति को एक नज़र से देखते हैं. गुनाहगार तो हम जैसे लोग हैं जो औरत को दो नज़रों से देखते हैं और ऐसे लोगों की बाहुल्यता हैं. मैं चाहता तो इन बातों का उल्लेख अपने आलेख में कर सकता हूँ पर मैं अधिकतर कमेन्ट में करता हूँ और अपने आलेखों में एक प्रश्न छोड़ जाता हूँ विचार और चिंतन के लिए. कमेन्ट में इस लिए क्योंकि विचारों के आदान प्रदान से हम अच्छी तरह से बातें एक-दुसरे के सामने रख सकते हैं. मैं जानता हूँ कि मेरी बातें लोगो को अजीब लगती हैं. लोग मुझे पागल, सनकी और आक्रोशित स्वभाव वाले बुलाते हैं . पर मैं जो कुछ भी कहता हूँ सोच समझकर, बहुत ही शांत स्वभाव से कहता हूँ. यह अलग बात हैं कि मेरा बात रखने का लहजा थोडा अजीब होता है और हकीकत हमेशा अजीब ही होती है........अपना कितना भी गुनाहगार क्यों न हो? कोई नहीं चाहेगा कि उसको सजा हो, उसे सामने वाला ही गलत नज़र आएगा...यह बात मैं सच के धरातल पर खड़ा होकर कह रहा हूँ......मैं दूसरों कि नहीं जनता मैं खुद स्वीकार कर रहा हूँ कि मैं गुनाहगार हूँ क्योंकि उन सब में, मैं भी शामिल हूँ और साथ ही मैं इस गुनाह की सजा पाने को भी तैयार हूँ और साथ में यह भी बोलता हु कि मुझे खुले आसमान के निचे ऐसी सजा दी जाय जैसी की आज तक किसी को नहीं दी गया हो......बहुत मजा आएगा.....देखताहूँ, कितने लोगों की मानसिकता आप बदल पाती हैं......पर मुझे सजा देने वाला वो शख्स होना चाहिए जो आज तक किसी बहन बेटी को गलत नज़र से नहीं देखा हो......और हाँ उस शख्स से उसकी शराफत का प्रमाण नहीं मागुंगा.....बस वो शख्स हजारों के बिच में मुझे सजा देने के लिए आ जाये. आखिर मैं भी देखना चाहता हूँ कि वो कैसा होगा........................

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पूनम जी, जिंदगी में माँ की क्या एहमियत होती है ये लगभग सभी इंसान समझते है(माँ का अपमान करने वाले इंसान की श्रेणी में नही बल्कि जानवर की श्रेणी में आते है.)मै अपनी माँ को कितना प्यार करता हूँ ये मै खुद नही जानता..और मुझे इस बात का भी आभास है की जब तक मेरी माँ है तभी तक मेरी साँसे चल रही है..आपने उप्पर काव्यात्मक रूप में जो अपनी कहानी बताई है वो बिलकुल हकीकत है..आपकी जगह मै होता तो मै भी यही करता लेकिन फर्क इतना है इसके बाद मेरा जीना मुश्किल होता..आज अगर मै जिन्दा हूँ तो सिर्फ और सिर्फ अपनी माँ की बदौलत.. मेरी नजर में ऐसा कोई शब्दों का जोड़ा नहीं नही बनता की माँ के प्यार का बखान कर सकू.या फिर माँ से दूरी का दर्द समझा सकूँ.. बस मै एक लड़का होते हुए भी अपनी माँ के साथ 24 घंटे रहना चाहता हूँ..इसी वजह से एक बार मैंने दिल्ली में अपनी बहुत अच्छी नौकरी के मौके को गँवा दिया था.. बहुत ज्यादा लिख चूका हूँ..आपके दर्द को समझ गया..बस यही कहूँगा.. आकाश तिवारी

के द्वारा: Aakash Tiwaari Aakash Tiwaari

पूनम जी, नमस्कार जीवन तब तक ही अच्छा लगता है............जब तक एक व्यक्ति उसे जिन्दादिली से जी सकें ............. आपकी ये काफी कर्णप्रिय रचना......................बहोत ज्यादा नहीं कह सकता क्यूंकि अपनों को खोना एक दुखद अहसास होता है................फिर माँ-बाप से ज्यादा प्रिय व्यक्ति के जीवन में और क्या हो सकता है........... कविता के बारे में कहना चाहूंगा............में ज्यादा बारीकियों के बारे में तो नहीं जानता किन्तु एक सुन्दर रचना को आप और सुन्दर बना सकती थी क्यूंकि ये आपके दिल की आवाज़ है...............इसका ये मतलब बिलकुल नहीं की मैं आपकी रचना को कमतर कह रहा हूँ.............बस और की उम्मीद थी आपसे.........एक बार सोचियेगा...................... आपने जब "ऐ पथिक" लिखा था तो मैंने कहा था की मैं "ओ राही" लिख रहा हूँ ..........बस उसे कुछ दिनों पहले ही पोस्ट किया है.................एक बार पढियेगा...............धन्यवाद

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के द्वारा: Jayprakash Mishra Jayprakash Mishra

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पूनम जी सादर नमस्कार, शिक्षा पूरी तरह व्यवसाय बन गया है.यदि माता पिता घर में बच्चे को पढ़ाने में सक्षम हैं तो ही उसके अच्छे भविष्य की कल्पना की जा सकती हैं वरना तो शाला प्रारम्भ होने के पहले ही मासिक परीक्षा के बाद माता पिता को बुला कर समझा दिया जाता है की बच्चा पढ़ाई में कमजोर है इसे ट्यूशन लगवाइये. किताबों की संख्या का गणित तो सीधे उनपर शाला को मिलने वाले कमीशन से जुडा है. इसका पढ़ाई से कोई लेना देना नहीं है.क्योंकि अक्सर देखने में आता है की कुछ किताबें तो वर्ष के अंत तक खुलती ही नहीं हैं और अंत में उसमे कुछ रिक्त स्थान भरवा दिए जाते हैं ताकि अगले वर्ष पुनः कोई अन्य बच्चा पुनः उस किताब का प्रयोग ना कर सके. सार्थक आलेख.

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पूनम जी, नमस्कार बहुत ही उचित सोच आपकी किन्तु मैं इसपर कुछ कहना चाहूँगा आपकी बातें तर्कसंगत है किन्तु वास्तविकता से पड़े है सबसे pahle तो ये hamaaraa देश है और इसमें हम भारतीय रहतें है और हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है की हम कोम्प्रिसन बहुत करतें है जो की कहीं से तर्क सांगत नहीं है अपनी उपयोगिता होनी चाहिए किन्तु वो किसी की देखादेखी नहीं इसलिए आपकी अंतिम पांति को मैं योग्य शैली का दर्जा नहीं दूंगा "रहीमदास" का एक दोहा है "कौन बड़ाई जलधि मिली गंग नाम सौ धिम, काहू की प्रभुता नहीं घटी पर घाट गए रहीम" इसका तो वैसे विस्तृत अर्थ होता है किन्तु मूल ये है की किसी को किसी के जैसे बन्ने की कोशिश नहीं करना चाहिए वरना उसकी अपनी अस्तित्व नहीं रह जाता अब सवाल ये है की आपके इन आदर्श वादी बातों का क्या तो आप की बातों में दम तो है कितु ये बस कहने से ज्यादा नहीं है नातिक पटल पर भले ही ये मूल्यवान हो किन्तु प्रक्टिकल नहीं है खैर ज्यादा तर्क नहीं देना चाहूँगा कुछ बुरा लागा हो तो माफ़ी

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नारी आज सिफॅ एक सामान बनकर रह गई है। कहने को तो लडकी - लडका एक समान है, सरकार ने दोनो को समान अधिकार दिए हैं, लेकिन सच तो यही है कि नारी के पास सबकुछ होते हुए भी कुछ भी नही है। भगवान ने ये धरती सबके लिए बनाई है, सबको पूरी आजादी से रहने का हक दिया है लेकिन पुरुषो ने नारी से उसका ये हक छीन लिया है। आज नारी की हालत ऐसी हो गई है कि वह कही भी अकेले जाने से डरती है, बेटी अगर घर से अकेली निकल जाए तो मां बाप को तब तक सुकून नही मिलता जब तक कि वह सही सलामत घर न लौट आए।और ऐसा इसलिए कयोकि आज गली-2 में हर दो कदम पर आपको ऐसे अनेको लडके मिल जाएंगे जिनके लिए नारी सिफॅ सामान है। आखिर में यही कहना चाहूंगी कि बडी ही हदय को छू लेने वाली रचना लिखी है आपने जो हम सभी को समाज का आईना दिखाती है। बधाई....

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पूनम जी, नमस्कार वाह, आपकी कविता शैली का मैं मुरीद हो गया लाजबाब और बेशकीमती सोच आपकी किन्तु आपने इसका नाम "टूटा ख्वाब" क्यूँ रखा ये तो स्वप्न की तरह प्रतीत होता है बहुत बधाई आपको .................................................................................................................. पूनम जी यदि आप मेरी बातों को अन्यथा ना ले तो एक बात कहना चाहूँगा ये मंच बहुत बड़ा है और यहाँ एक से बढ़ कर एक रथी, अति रथी और महारथी लोग लिखते है जो की ना सिर्फ बहुत उत्कृष्ट लिखते है बल्कि वो मार्गदर्शन भी करते है आपके पिछले पोस्ट पर आदरणीय शशि भूषण जी ने अपने कुछ सुझाव दिए थे जिनका आपने कोई उत्तर नहीं दिया आप एक विदुषी महिला है किन्तु यदि आप अपने लेखन शैली में और निखार लाना चाहती है तो लोगों से मेल जोल बढ़ाइए और दूसरों की भी कविताओं और लेखों को पढ़िए इससे आपको आगे का मार्ग मिलेगा आपकी कवितायें अनमोल है इसे रोज ना पोस्ट करे लोग गंभीरता से नहीं ले सकेंगे ये मेरे सुझाव थे मानना या ना मानना ये तो आप का ही काम है , ये बाते मैंने इस लिए कहीं क्यूंकि आप की लेखनी में वो दम नजर आ रहा है जो आपको आगे ले जा सके धन्यवाद

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तोशी जी,नमस्कार "स्त्रियों" के रूप को दर्शाती आपकी बहोत ही प्रसंसनीय कविता है वैसे मुझे संदेह है की आपको इस पर स्त्रियों का पूर्ण समर्थन मिलेगा या नहीं किन्तु आप की शब्द सैली बहुत उत्तम है, आपने अपनी कविता को सिर्फ जनरल में ही पोस्ट किया है कृपया कर इसे कविता में भी पोस्ट करे ताकि ज्यादा लोग इसका लुफ्त उठा सकें "तुम स्त्री हो, हां तुम ही हो, तेरे अन्दर एक विस्वास है, तुम ही तो हो जो जगत निर्माता हो, तुम जनीनी हो तुम माता हो तुम इन्शान की भाग्यविधाता हो तुम श्रेष्ठ हो तुम सा कोई नहीं तुम मानव की मानवता हो तुम फूलों की कोमलता हो तुम चंडी भी तुम काली भी तुम गंगा हो और जमुना हो" स्तुतियाँ तो और भी थी पर क्या कहूँ बस दिल को छूती कविता आपकी लिखते रहें

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN