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"सीसा " और हमारी सेहत

Posted On: 17 May, 2012 Others में

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kitaaaaaaaaaaanu


‘सीसा ‘ और हमारी सेहत

===============

पर्यावरण के लिए घातक सीसे से निजात दिलाने की प्रक्रिया के सिलसिले में सीसीएसयू
(चौधरी चरण सिंह यूनिवरसिटि मेरठ )ने नया इतिहास रचा है । रसायन विभाग ने प्लास्टिक के उत्पादों मे इस्तेमाल होने वाले रसायनो के विकल्प के रूप मे एक आर्गेनिक फार्मूले का कॉम्पाउंड तैयार किया है और इस फार्मूले को 20 साल के लिए पेटेंट कर दिया गया है ।विशेषज्ञों का मानना है कि इससे जीवन पर कसते प्लास्टिक के फंदे से काफी हद तक राहत मिलेगी केन्द्रीय विज्ञान प्रोद्योगिकी मंत्रालय कि बनारस स्थित एजेंसी टेक्नोलोजी फेसिल्टेशन सेंटर ने उद्योगों मे इस तकनीक को लागू करने के लिए सीसीएसयू से संपर्क किया है ।
पोलीमिनाइल क्लोराइड यानि पीवीएस को हीट करने पर एचसीएल नामक जहरीली गैस कम्पाउन्ड को ब्रेक कर देती है जिससे बचाने के लिए सीसे का प्रयोग करना पड़ता है ।विवि के रसायन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ0 आरके सोनी ने तीन वर्ष के शौध के बाद ओर्गेनिक स्टेबलाइजर का निर्माण किया ।जिसे पीवीसी मे लगाकर 160 डिग्री ताप तक टूटने से बचाया जा सकता है । बाज़ार में अब यह सीसे का सस्ता एंव टिकाऊ विकल्प बनकर उभरा है ।
यह एक सुरक्षित और सस्ता विकल्प है ।
एनसीआर की हवा में 0.55 से 1.25 माइक्रोग्राम प्रति घन सेंटीमीटर सीसे की उपस्थिति पाई गई है । खाद्य पदार्थों मे दिल्ली ,मेरठ ,गाज़ियाबाद मे 18 माइक्रोग्राम प्रति ग्राम की मौजूदगी मिली । हर कल कारखानो का दूषित पानी किसी नदी या तालाब में जाकर गिरता है। जिस कारण इन नदी ,नाले, तालाबों का पानी तो दूषित हुआ ही है साथ में इनके किनारे उगाई जाने वाली बे मौसमी सब्जियाँ बहुत ही विषैली होती हैं । जो फायदे की जगह नुकसान ज़्यादा करती हैं हिंडन नदी हो या यमुना इनमे किनारे से अंदर दूर तक उगाई जाने वाले फल व सब्जियाँ पूरी दिल्ली तथा आस-पास के इलाको में बेची जाती हैं ।जिनमे सीसे की मात्रा अत्यधिक पाई जाती है जो स्वास्थ्य
पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं । जिससे मानव शरीर में प्रति रोधक क्षमता घट जाती है और वो कई रोगो का शिकार हो जाता है जैसे –वृक्क व लीवर के कैंसर ,हीमोग्लोनिन लेवल डिस्टर्ब ,तंत्रिका तंत्र का नाकाम होना इत्यादि ।इसी प्रकार उद्योगो के निकट उगाई जाने वाली सब्जियों में भी सीसे की खतरनाक मात्रा पाई गई है । रक्त में 70 माइक्रोग्राम प्रति मिली तक बढ्ने से जहरीले प्रभाव साफ नज़र आने लगे हैं । इसी के साथ एक समस्या और भी जुड़ी हुई है ,है तो वो टोपिक से अलग परंतु मैं ये कहना भी ज़रूरी समझती हूँ । इन्ही नदी- तालाबो के किनारे उगाये जाने वाले फल या सब्जियों को इन्ही के दूषित पानी में धोया जाता है , जिस के कारण कई खतरनाक विषाणु इन उत्पादकों से चिपक जाते हैं और वो इन फल व सब्जियों को  साफ पानी मे धोने के बावजूद इनसे चिपके रहते हैं और मानव शरीर मे प्रवेश कर जाते हैं । कई तो 2 घंटे तक सब्जियों के उबालने के बावजूद ज़िंदा रहते हैं। और भोजन के साथ शरीर में पहुँच जाते हैं ।

जहाँ हमारे वैज्ञानिक अपने शौधों से हर बीमारी हर समस्या से छुटकारा पाने के लिए नए-नए शौध करके मनुष्य जीवन को फिर से सुगम बनाने के लिए प्रयासरत हैं वहीं हम जन मानस का भी ये नैतिक कर्तव्य बनता है की हम लोगो को जागरूक करें कि वो ऐसी जगहों से उगाये गए फल व सब्जियों का बहिष्कार करें । जो मानव शरीर के लिए बेहद खतरनाक हैं । …. पूनम मनु

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41 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

dineshaastik के द्वारा
May 26, 2012

मनु जी मैंने फीडबैक  में पड़ा कि आप जा रहीं हैं, कृपया इस  पर पुनः  विचार करें। क्योंकि मैं आप जैसी सटीक  एवं तार्किक  आलेख  लिखने वाली लेखिका के विचारों से वंचित नहीं होना चाहता।

    मनु (tosi) के द्वारा
    May 27, 2012

    हाँ दिनेश जी मैं जाना चाहती थी इस मंच पर होने वाले लड़ाई -झगड़ों से दूर ,पर अब अभी नहीं जाऊँगी पहले खुद को आजमाउंगी कि कितना बर्दाश्त कर सकती हूँ … सबको लड़ते देख दुख होता है ,, पता नहीं क्या-क्या हो रहा है …आपकी भावना का मैं शुक्रिया अदा करती हूँ कम-स-कम सभी लोग एक जैसे नहीं हैं… धन्यवाद दिनेश जी ध्नयवाद

Rajesh Dubey के द्वारा
May 25, 2012

बहुत अच्छी जानकारी आपने दी, अभी तो हर जगह मिलावट का बाज़ार है.वाकई वैसे भी विषाणु हैं जो दो घंटे उबलने पर भी नष्ट नहीं होते हैं, लोगों के बीच जागरूकता फैलाने की जरुरत है,इस तरह के हानिकारक रसायनों, और विषाणु से.

    मनु (tosi) के द्वारा
    May 27, 2012

    आदरणीय राजेश जी आपका तहे दिल से शुक्रिया करती हूँ कि आपने अपना अमूल्य समय व प्रतिक्रिया दी सादर धन्यवाद !!!

pawansrivastava के द्वारा
May 23, 2012

मनु जी ज्ञानवर्धक आलेख के लिए धन्यवाद ….वैसे जिस संभावित खतरे को आपने अपने लेख के ज़रिये इंगित किया है ,वह सिर्फ ‘Tip of the Ice berg ‘है ….polythene में खाद्य पदार्थ लाना ,अलमुनियम के बर्तन में खाना पकाना ,CFC युक्त प्रोडक्ट जैसे (Perfume,essense stick,Friz) वगैरह इस्तेमाल करना ,ज्यादा पैसे बटोरने की नीयत से सब्जियों ,मुर्गों ,बकरों का आकार बड़ा करने के लिए उन्हें anti -biotic देना ..और लोगों द्वारा उन्हें आहार के रूप में इस्तेमाल करना ….ऐसे अनगिनत खतरे सुरसा जैसा मूंह बाये लोगों को लीलने के लिए खड़े हैं ….भारत के घरों में छत के लिए एस्बेस्टस का इस्तेमाल होता है ..यूरोपीय देशों में एस्बेस्टस के इस्तेमाल पे प्रतिबन्ध है क्यूंकि इससे कैंसर का खतरा होता है ..वहां के खेतों में organic -produces pesticide वाले produces की जगह ले रहे हैं ….निदान लोगों के चेतनाशील होने में छिपा है …आपने इस दिशा में प्रयास किया है इसके लिए धन्यवाद -पवन ( लैप टॉप वाला सूफी )

    मनु (tosi) के द्वारा
    May 27, 2012

    आदरणीय पवन जी , सादर नमस्कार !! आपका अभिनन्दन आप मेरे ब्लॉग पर आए !!और आपकी सार्थक प्रतिक्रिया के लिए मैं दिल से आभारी हूँ ,,, आपने सही कहा निदान लोगो के चेतनाशील होने मे ही है …

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
May 23, 2012

उपयोगी एवं तथ्यात्मक जानकारी,मनु जी.शीशा तो वाहनों के इंधन में भी पाया जाता है.unleaded पेट्रोल में MTBT पाया जाता है, जो छोटे मोटे कीड़े मकोड़े को मार देती है जो गोरैया एवं अन्य छोटे पक्षियों का भोजन होती है

    मनु (tosi) के द्वारा
    May 27, 2012

    धन्यवाद आदरणीय राजीव जी जो आप मेरे ब्लॉग पर आए … और अपनी अमूल्य प्रतिक्रिया दी !!! सादर !!!

follyofawiseman के द्वारा
May 23, 2012

टीचर जी, गुड ईवनिंग, ”Pakiya” …. ‘उपस्थित हूँ मैडम’ “लखना” …….’जी टीचर जी हाजिर हूँ’ …………..अच्छा, बच्चो आज हम लोग ग़ज़ल सीखेंगे…..’माईडम जी ऊ का होता है’……….. ‘अरे बाबा वही तो सीखना है….’ ‘जी मडम जी तो सिखाईए’ ये अच्छा है…..’कहीं से ईट, कहीं से पत्थर भानुमती ने कुनमा जोड़ा…’ ये अच्छा किया आपने हम लोगो को ग़ज़ल सीखा दिया…..शब्द तो हम सिख ही चुके थे…….बाँकी काम आपने कर दी……कॉपी अँड पेस्ट ……! इसको कहते है कालाकारी……… (जानकारी बाँटने के लिए धन्यवाद…….., बाबू लोग मन लगा के पढ़ो….ज्ञान है बाँटने से बढ़ता है….) हम अन्धो की जिंदगी मे ज्ञान का दीपक जलाने के लिए लाख लाख सुकरिया…..! yeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeee! छुट्टी…………………..! (यहाँ भी महोदय हमारी ही गलती और वो क्या जो आप लोगो को डराते हैं कभी जान से मारने कि धमकी देते हैं … अरे ये तो सोचिए महाशय !हमारी जगह कोई और होता तो उसका तो डर के मारे राम – नाम सत हो गया होता तो , ये तो हम हैं कि बच गए … follyofawisemanजी”……………..ऐसा आपने मेरे बारे क्यों लिखा…..ये आपके माँ पोस्ट के सबसे नीचे पोस्ट है…….मुझे समझ मे नहीं आया यह…..क्या था ये….)

    मनु (tosi) के द्वारा
    May 23, 2012

    wiseman जी किसी कारण से ये गजल प्रारूप मुझे हटानी पड़ रही है… कारण आपको क्यूँ बताऊँ ??? पर आपके द्वारा भेजी एक मेरी ही रचना पर की  आपकी टिप्पणी बेशक मैंने डिलीट कर दी है पर मेरे इनबॉक्स में आपकी वो जान से मारने वाली धमकी की एक  कॉपी मेरे पास मौजूद है … लेकिन आप ऐसा करते क्यूँ हैं ??? दूसरों को परेशान करने  में आपको इतना आनंद क्यूँ आता है … दिखने मे तो ठीक ठाक हो … फिर

    follyofawiseman के द्वारा
    May 23, 2012

    अपने तो कमाल का रहस्य पैदा कर दिया है….’जान मरने की धमकी और मैं…..’ ये तो हद हो गई…..एक चीटी भी मुझसे मरेगा की नहीं इसमे शक है……. आप मेरे पे इतनी अनुकंपा कीजिए Please Please वो वो धमकी की कॉपी मेरे मेल ID पर मुझे भेज दीजिए…..मैं सच मे देखना चाहता हूँ……की वो क्या है…… “कारण आपको क्यूँ बताऊँ ??? “ मत बताइए…मैंने उसे कॉपी कर के save कर लिया है……  :) …..हाँ लेकिन अगर किसी के विरोध के कारण अगर आपने हटाया है तो ज़रूर बताइए…… “लेकिन आप ऐसा करते क्यूँ हैं ??? दूसरों को परेशान करने में आपको इतना आनंद क्यूँ आता है “ ….ये राज़ की बात है मैं भी आपको क्यों बताऊँ…….. :)    आप मुझे वो मेल  भेज दीजिए मैं फिर आपको बता दूँगा……. ” दिखने मे तो ठीक ठाक हो … फिर……..”  हूँ….Hun……!(गला साफ कर रहा हूँ )  ’ये Pakiya, एक कप चाय लगा मैडम जो को चाय पीला ज़रा…..’   ’जी भाई अभी लाता हूँ…..कटिंग चलेगी क्या…..’   ’हाँ चलेगी बे जल्दी ला….’

dineshaastik के द्वारा
May 21, 2012

पूनम जी नमस्कार, बहुत ही उपयोगी एवं तथ्यात्मक  जानकारी देने के लिये आभार। लेकिन इसका सार्थक  समाधान क्या है।  शोथ करके लिखे हुये आलेख  की प्रस्तुति के लिये बधाई…

    मनु (tosi) के द्वारा
    May 22, 2012

    धन्यवाद दिनेश जी !!! समाधान तो काफी हद तक यही है की हम सीजनल फल और सब्जियाँ खाएं

shashibhushan1959 के द्वारा
May 19, 2012

आदरणीय मनु जी, सादर ! “सीसे” के खतरनाक परिणामों से सचेत करती रचना ! सार्थक एवं आवश्यक जानकारी ! हार्दिक धन्यवाद !

    मनु (tosi) के द्वारा
    May 19, 2012

    धन्यवाद आदरणीय शशि भूषण जी !!!

follyofawiseman के द्वारा
May 19, 2012

If we turn a constituent of a proposition into a variable, there is a class of propositions all of which are values of the resulting variable proposition. In general, this class too will be dependent on the meaning that our arbitrary conventions have given to parts of the original proposition. But if all the signs in it that have arbitrarily determined meanings are turned into variables, we shall still get a class of this kind. This one, however, is not dependent on any convention, but solely on the nature of the pro position. It corresponds to a logical form–a logical prototype.

    मनु (tosi) के द्वारा
    May 19, 2012

    काश ! आपकी इस बात का मैं जवाब दे सकती !!!wiseman जी

ajay kumar pandey के द्वारा
May 18, 2012

तोशी जी नमन आपका आलेख मुझे भी अच्छा लगा कृपया मेरे ब्लॉग पर मेरे दो आलेख कार्टून विवाद और यज्ञोपवित संस्कार की विधि और पूजा का विधान और यज्ञोपवित के बारे में जरुर पढ़े में इन छुट्टियों में कही बाहर जा रहा हूँ इसलिए ब्लॉग नहीं लिखूंगा तो मेरे दो आलेखों पर अगर नज़र डाल लेती तो सुकून से बाहर घुमने जाता क्या है की मुझे आलेख पर नज़र डालने वाले प्रबुद्ध लेखकों से मिले बिना चैन नहीं आता धन्यवाद

    मनु (tosi) के द्वारा
    May 19, 2012

    बिलकुल अजय !मैं अभी वहाँ पहुँचती हूँ । और धन्यवाद कि आप यहाँ आए !

minujha के द्वारा
May 18, 2012

ज्ञानवर्धक आलेख   मनु जी मुझे आपके आलेख से बहुत कुछ जानने को मिला,आभार

    मनु (tosi) के द्वारा
    May 19, 2012

    आभारी हूँ आपकी मीनू जी !धन्यवाद !!!

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 18, 2012

प्रिय मनु जी, सस्नेह तथ्यात्मक जानकारी के लिए धन्यवाद

चन्दन राय के द्वारा
May 18, 2012

मनु जी , समाज की चेतना को जगाती बहुत ही ज्ञानवर्धक अभिव्यक्ति , आज जिस तरह से हम लगातार प्रदुषण बढ़ा रहे है , वह समय दूर नहीं जब संसार का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा , काश हर कोई आपकी तरह जिम्मेदार और जागरूक होता

yogi sarswat के द्वारा
May 18, 2012

जब तक मनुष्य खुद जागरूक नहीं होगा पर्यावरण की सुरक्षा संभव नहीं है. इन उद्योगपतियों से तो उम्मीद रखना ही बेकार है. अच्छा लिखा आपने… लेकिन आदरणीय तोशी जी अगर हर चीज में इस तरह से हम कमिय या उसके दोष देखते रहे तो कुछ भी खाना मुश्किल हो जायेगा ! इसलिए हम जानबूझकर ज़हर खाने को मजबूर भी हैं ! बहुत सटीक लेखन

    मनु (tosi) के द्वारा
    May 18, 2012

    आदरणीय योगी जी धन्यवाद आपका ! पर सावधानी बहुत आवश्यक है!!!

    yogi sarswat के द्वारा
    May 25, 2012

    अभी मैंने पढ़ा की आपने लिखा है -आप जा रही हैं ! मगर कहाँ ? क्यों ? ऐसा क्या हुआ जो आपको ये मंच छोड़ना पड़ रहा है !

nishamittal के द्वारा
May 18, 2012

उपयोगी जानकारी प्रदान करने के लिए धन्यवाद.पढ़ा था पेपर में परन्तु विस्तृत जानकारीप्राप्त हुई

    मनु (tosi) के द्वारा
    May 18, 2012

    धन्यवाद मेम (निशाजी )!

akraktale के द्वारा
May 18, 2012

मनु जी नमस्कार, आपने सीसे के उपयोग के घातक असर के बारे में लिखा है जो की इलेक्ट्रोनिक्स के उद्योग की सबसे आवश्यक धातु है हम अनुपयोगी इलेक्ट्रोनिक वस्तुओं को कहीं भी फेंक देते है इसे भी सबको समझना होगा. सब्जियों के उगाने के बारे में हमें सही ज्ञात होने का कोई सही माध्यम नहीं है किन्तु सही यही है की अच्छी तरह से धोकर और उबालकर उपयोग से ही कुछ राहत संभव है मै एक फल अंगूर का जिक्र करना चाहता हूँ जिस पर छिड़के जाने वाले केमिकल को कई बार धोने के पश्चात भी निकाल पाना असंभव होता है और अक्सर मरीज इस फल का सेवन करते हैं यह विडंबना है.जाग्रति देते अच्छे आलेख पर बधाई.

    मनु (tosi) के द्वारा
    May 18, 2012

    आदरणीय अशोक जी , सादर नमस्कार ! ऐसा ही कुछ जवाहर भाई जी ने कहा जिसका मैंने सही जवाब देने कि कोशिश कि है । वैसे तो हर फल -सब्जी के साथ अब ऐसाही होता है मनुष्य लालच मे जाने कैसे-कैसे कर्म कर रहा है । अभी मैंने थोड़े डीनो पहले पढ़ा था कि आलू को पहाड़ी आलू दिखा कर मोटा मुनाफा कमाने के लिए उसे तेज़ाब मे डुबोकर निकालते हैं , जो आलू का साइज़ छोटा कर देता है और उसके अंकुर खत्म कर देता है सोचो मनुष्य शरीर के लिए वो कितना घातक होगा । बहुत घृणा होती है ऐसे लोगो से पर क्या करें पकड़ में ही नहीं आते ये लोग ।

jlsingh के द्वारा
May 17, 2012

फिर सब्जी कहाँ से खरीदें ! कैसे मालूम करें कि यह सब्जी कहाँ से लाई गयी है? हम अगर खुद खेत में उपजाते हैं तब भी बिना रसायनों के प्रयोग के फल अच्छे नहीं होते. जमीन की उर्वरा शक्ति दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है. समाधान क्या है? हम सभी सुविधाभोगी हो गए हैं जान बूझकर भी गलती करते हैं. वैसे जागरूकता बढ़ाने के लिए आपका लेख उत्तम है. बधाई मनु जी !

    मनु (tosi) के द्वारा
    May 18, 2012

    आदरणीय जवाहर भाई जी , सादर नमस्कार ! आप सही कह रहे हैं परंतु एक अंतर हैं इन नदी नालियो के किनारे उगाई जाने वाली सब्जियों और खेतो में उगाई जाने वाली सब्जियों मे वो ये कि दूषित जल के किनारे उगाई जाने वाली सब्जी हमेशा जहरीली होती है और गंदे पानी में धोने के कारण उनमें कई ज़िंदा विषाणु हमारे शरीर में पहुँच जाते हैं जो कई घंटो तक घनी आग पर उबालने के बाद भी नष्ट नहीं होते वो ज़िंदा रहते हैं जबकि खेतों में उगाई जाने वाली सब्जियों पर होने वाले रसायनो को का प्रभाव सही से धोने के बाद पकाने पर काफी हद तक कम हो जाता है । इसलिए खेतों कि सब्जियाँ ज़्यादा बेहतर हैं एक तो वो हमे सीजन में मिलती हैं , दूसरे गंदे पानी मे नहीं धोई जाती ,

May 17, 2012

पूनम जी जब तक मनुष्य खुद जागरूक नहीं होगा पर्यावरण की सुरक्षा संभव नहीं है. इन उद्योगपतियों से तो उम्मीद रखना ही बेकार है. अच्छा लिखा आपने…

    मनु (tosi) के द्वारा
    May 18, 2012

    धन्यवाद कुमार गौरव जी !सही कह रहे हैं आप हमे खुद जागरूक होना होगा !!

ANAND PRAVIN के द्वारा
May 17, 2012

आदरणीय पूनम जी, नमस्कार समाज को जागरूक करता लेख………बहुत सुन्दर यह आधुनिकता ही हमें मार डालेगी एक दिन…………पर क्या करें सब आदत से मजबूर हो चुकें है आज कल बिच बिच में आप कहाँ गायब हो जा रहीं है…………..

    मनु (tosi) के द्वारा
    May 18, 2012

    आदरणीय आनंद जी ! थोड़े से पारिवारिक कारणो से आजकल मेरे प्यारे ब्लॉग से दूरी बनी हुई है ॥ आपकी अमूलय प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद !!!!

sinsera के द्वारा
May 17, 2012

स्वास्थ्य के लिए खतरनाक तत्वों से सचेत करता उत्तम आलेख….बधाई…

    मनु (tosi) के द्वारा
    May 18, 2012

    धन्यवाद सरिता जी !आभारी हूँ कि आप मेरे ब्लॉग पढ़ती हैं और उनपर अपनी राय भी देती हैं !!!सादर

May 17, 2012

पर्यावरण के प्रति सचेत करते हुए आलेख के लिए ……….हार्दिक आभार!!

    मनु (tosi) के द्वारा
    May 18, 2012

    नमस्कार अनिल जी ! आपके हार्दिक आभार को नमन ………….!!!

मनु (tosi) के द्वारा
May 27, 2012

आदरणीय योगी जी ! सादर नमस्कार ! मंच पर जो हो रहा है ,उससे आप वाकिफ हैं ॥ क्या कहूँ हाँ मैंने उस दिन जाने का फैसला किया था … पर मेरे बच्चों ने समझाया माँ आप कहते हो हर जगह हर तरह के लोग मिलेंगे अगर ऐसे किसी भी व्यक्ति या विचार से घबरा कर भागोगे तो कैसे जियोगे और आप आज क्या कर रहे हो … तब मैंने सोचा नहीं इतनी जल्दी नहीं मैं इतनी जल्दी नहीं घबरा सकती … बाद मे बाद की देखेंगे पर अभी नहीं… मैं आपकी दिल से आभारी हूँ कि आपने और दिनेश जी ने ये जानने कि कोशिश की ‘कि क्या हुआ ? धन्यवाद योगी जी बहुत -बहुत धन्यवाद !!!


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